श्रीपाद अवधूत की कलम से।
*विश्व धर्म सभा शिकागो में विवेकानंद जी के अभूतपूर्व उद्बोधन के बाद उनकी अमेरिका और यूरोप सब दूर वाहवाही हो रही थी इस बात से कुछ अमेरिकन पत्रकार इस काले इंडियन की प्रसिद्धि से तिलमिला रहे थे व यह अवसर ढूंढ रहे थे कि किस प्रकार विवेकानंद जी का मजाक उड़ाया जाए।*
*उन्हीं में से एक पत्रकार ने उनसे मजाक उड़ाने के दृष्टिकोण से प्रश्न पूछाः-_*
_*पत्रकार-*
“महोदय, आपके आखिरी *व्याख्यान में,* आपने हमें *योगायोग (कांटैक्ट) और संयोग (कनेक्शन)* के बारे में बताया। यह वास्तव में उलझा हुआ है। क्या आप समझा सकते हैं?”_
_*विवेकानंद जी मुस्कुराये और पत्रकार से पूछा:-*
_”क्या आप न्यूयॉर्क से हो?”_
_*पत्रकार-* “हाँ …”_
_*विवेकानंद जी-*
“घर पर कौन कौन हैं?”_
_*पत्रकार ने अनुभव किया कि भिक्षु अपने प्रश्न का उत्तर देने से बचने की कोशिश कर रहा हैं क्योंकि यह एक बहुत ही व्यक्तिगत और अनचाहा सवाल था।
फिर भी
*पत्रकार* ने कहा: *”मां की मृत्यु हो गई है। पिताजी हैं। तीन भाई और एक बहन। सभी विवाहित …”_*
_*विवेकानंद जी ने उसके चेहरे पर एक मुस्कान के साथ फिर से पूछा:-*”क्या आप अपने पिता से बात करते हैं?”_
_पत्रकार स्पष्ट रूप से नाराज लग रहा था …_
_*स्वामीजी-* “तुमने आख़िरी बार उनसे बात कब की….????”_
_*पत्रकार ने अपनी परेशानियों को दबाते हुए कहा:-* “एक महीने पहले हो सकता है।”_
_*साधु-*
“क्या आप भाई और बहन से अक्सर मिलते हैं? आप पारिवारिक मिलन के रूप में आखिरी बार कब मिले…????”_
_*इस बिंदु पर पत्रकार के माथे पर पसीना दिखाई दिया।*_
*_अब स्वामी जी पत्रकार का साक्षात्कार कर रहे थे।_*
*_एक शोक के साथ पत्रकार ने कहा- “हम दो साल पहले क्रिसमस में मिले थे।”_*
_*स्वामी जी-* “आप सभी कितने दिन एक साथ रहते थे?”_
_*पत्रकार* (पसीने पर पसीना पोंछते हुए) ने कहा: “दो या तीन दिन …”_
_*स्वामीजी:-* “आपने अपने पिता के साथ कब समय बिताया, उनकी बगल में कब बैठे…????”_
*_पत्रकार परेशान और शर्मिंदा दिख रहा था और एक पेपर पर कुछ लिखना शुरू कर दिया …!_*
_*स्वामी जी-* “क्या आपने उनके साथ नाश्ता, दोपहर का भोजन या रात का खाना खाया था…????
क्या तुमने पूछा कि वे कैसे थे…????
क्या तुमने पूछा कि उसकी मां की मृत्यु के बाद उनके दिन कैसे गुज़र रहे हैं…..?????”_
*_आंसू की बूंदें पत्रकार की आंखों से बहने लगीं।_*
_*विवेकानंद ने पत्रकार का हाथ पकड़ लिया और कहा:-* “शर्मिंदा मत हो, परेशान या उदास मत हो। मुझे खेद है अगर मैंने आपको अनजाने में चोट पहुंचाई है …!_
_लेकिन यह मूल रूप से *”कांटैक्ट और कनेक्शन (योगायोग और संयोग)”* के बारे में आपके प्रश्न का उत्तर है। आपका पिता के साथ *’कांटैक्ट’* है लेकिन आपका उनके साथ *’कनेक्शन’* नहीं है।
आप उनसे जुड़े नहीं हैं। कनेक्शन दिल और दिल के बीच है … एक साथ बैठकर भोजन साझा करना और एक-दूसरे की देखभाल करना; स्पर्श करना, हाथ मिलाकर, आंखों से संपर्क करना, कुछ समय बिताएं … आप भाइयों और बहनों के पास *’कांटैक्ट’* है लेकिन आपके पास एक दूसरे के साथ *’कनेक्शन’* नहीं है …. “_
_*पत्रकार ने अपनी आंखों को पोंछ दिया और कहा:-* “मुझे एक अच्छा और अविस्मरणीय सबक सिखाने के लिए धन्यवाद”_
*_वर्तमान समय की यही वास्तविकता है। फेसबुक पर हमारे हजारों फ्रेंडस है। हमारे मोबाइल की कॉन्टेक्ट्स लिस्ट में हजारों नाम हैं। हम व्हाट्सएप के सैकड़ों समूहों में जुड़े हैं।रोज़ हजारों मेसेजो का आदान प्रदान करते हैं।*
*चाहे घर पर या समाज में सभी के पास बहुत सारे संपर्क/कांटैक्ट हैं लेकिन कोई कनेक्शन नहीं है। कोई जुड़ाव नहीं..है! हर कोई अपनी दुनिया में मशगूल है।_*
_आइए हम *”लगाव/जुड़ाव”* बनाए रखें, हम *”कनेक्शन”* रखे;
*संघ की शाखा इसका सर्वोत्तम उदाहरण हैं।*
*शनिवार या मंगलवार को गाँव के मन्दिर में होने वाले सुंदरकांड की मंडली। या किसी पर्व विशेष पर एकत्रित होकर धार्मिक कार्य करने वाली मंडली वास्तव में एक दूसरे से जुड़ी हुई। हैं।* *देखभाल, बातें साझा करना और हमारे सभी प्रियजनों के साथ समय बिताना। यही वास्तव में लगाव का सबसे महत्वपूर्ण साधन है।_*
_*वर्तमान सन्दर्भ मे तो यह बहुत अधिक आवश्यक भी है।*
*योगी जी ने यह बात भले राजनीतिक रूप से कही हो कि “बंटेंगे तो कटेंगे।”*
*”एक रहेंगे सेफ रहेंगे।”*
*”एक रहेंगे नेक रहेंगे।”*
*यही वास्तविकता है।*
*यही असली कनेक्शन है।*
*आइए हम इससे सीखें और अपने जीवन में सुधार करें! एक दूसरे से जुड़े रहें एक दूसरे से लगाव बना रहें है*_
।। अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त।।

