*———-: गायत्री मंत्र की सरंचना :——-*
महर्षि विश्वामित्र ने , ब्रह्मा से एक मंत्र प्राप्त किया और उसे सिद्ध कर, उसकी पूर्ण उपासना विधि निर्मित की , तत्पश्चात इसे गायत्री मंत्र कहा गया। गायत्री मंत्र को मंत्रराज कहा जाता है। क्योंकि, इस मंत्र से महा उद्देश्य पूरे किए जा सकते हैं।
स्वयं ऋषि विश्वामित्र भी , इस मंत्र के बल पर, एक अलग विश्व बनाने में सक्षम हो सके। बड़े-बड़े ऋषि मुनि भी, अपने जीवन में गायत्री मंत्र को उतारने का प्रयास करते रहते हैं।
हर एक सनातनी गायत्री मंत्र का महत्व जानता है और फिर उसके लाभ से परिचित है। परंतु, आज हम इसके अनेकों उपाय में से रोग नाश, एवं ग्रह शांति के लिए, गुणकारी प्रयोगों को जानने का प्रयास करेंगे, तो आइए जानते हैं, गायत्री मंत्र से होने वाले कुछ लाभकारी फायदे।
गायत्री मंत्र ——
” ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।। ”
अर्थात,
उस प्राण स्वरूप, दुख नाशक, सुख स्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पाप नाशक, देव स्वरूप, परमात्मा को हम अंतरात्मा में धारण करें, वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करें।
“प्रणव ॐ “का संदेश है, परमात्मा सभी प्राणियों में समाया हुआ है, इसलिए निष्काम भाव से, सभी के प्रति समर्पित होकर कर्म करो।
“भू” का संदेश है, शरीर अस्थाई औजार मात्र है । इस पर अत्यधिक आसक्त न होकर, आत्म बल बढ़ाओ और श्रेष्ठ मार्ग का अनुसरण करो।
“र्भुव:” का संदेश है, संस्कारों से जूझते रहने वाला मनुष्य, देवत्व को प्राप्त करता है।
“स्वः” का संदेश, अपने विवेक द्वारा शुभ बुद्धि से, सत्य को जानने, संयम और त्याग की नीति का आचरण करने के लिए, अपने को तथा दूसरों को प्रेरणा देनी चाहिए।
“तत्स” शब्द का संदेश है , वही बुद्धिमान है, जो जीवन और मरण के रहस्य को जानता है, भय और आसक्ति रहित जीवन जीता है।
“सवित्यु” को शब्द का संदेश है , मनुष्य को सूर्य के समान तेजस्वी होना चाहिए।
“वरेण्यम” शब्द का संदेश है, प्रत्येक को श्रेष्ठ देखना,श्रेष्ठ चिंतन करना,श्रेष्ठ विचारणा,श्रेष्ठ कार्य करना चाहिए।
“भर्गव” का शब्द का संदेश है,मनुष्य को निष्पाप बनना चाहिए। पापों से सदैव सावधान रहना चाहिए।
“देवस्य” का संदेश है,देवताओं के समान शुद्ध दृष्टि रखने से, परमार्थ कर्म में निरत रहने से, मनुष्य के भीतर और बाहर देवलोक की सृष्टि होती है।
“धीमही” शब्द का संदेश है,हम सब लोग,ह्रदय में सब प्रकार के पवित्र शक्तियों को धारण करें, इसके बिना मनुष्य सुख शांति को प्राप्त नहीं होता।
“धियो” शब्द बतलाता है कि,बुद्धिमान को चाहिए कि वह उचित-अनुचित का निर्णय तर्क,विवेक और न्याय के आधार पर,वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए करें।
“यो नः” पद का तात्पर्य है,हमारी जो भी शक्तियां एवं साधन हैं, उनकी न्यून से न्यून भाग को ही, अपनी आवश्यकता के लिए प्रयोग में लाएं,शेष निस्वार्थ भाव से असमर्थों में बाट दें।
“प्रचोदयात्” शब्द का तात्पर्य है, मनुष्य को अपने आपको तथा दूसरों को,सत्य मार्ग पर चलने के लिए प्रेरणा दें..!!

