मुजफ्फरनगर। क्या राजपूत समाज की नाराजगी भाजपा पर भारी पडेगी। इसे लेकर सवाल खडे हो रहे हैं। ऐसे में इसका सबसे ज्यादा प्रभाव मुजफ्फरनगर सीट पर पड़ सकता है। यहां केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान हैट्रिक का सपना लेकर चुनाव मैदान में हैं। इस बार सपा-बसपा के अलग-अलग चुनाव लड़ने और रालोद के साथ आ जाने को भाजपा अनुकूल मान रही है। भाजपा शासन में कानून व्यवस्था और विकास कार्यों के बल पर भाजपा की उम्मीद टिकी हैं, लेकिन हिंदुत्व के नाम पर एकजुटता का ताना बाना बिखरा है। पार्टी संगठन में विरोधाभास खत्म नहीं हो पा रहा है। ऐसे में राजपूत समाज का खुला विरोध व टिकैत परिवार का विरोध भी उसकी चिंता का विषय बना है। भाजपा को जाट और ओबीसी पर भरोसा है। हालांकि पंजाबी, ब्राह्मण और त्यागी समाज का एक वर्ग अलग अलग कारणों से भाजपा से खिन्न है। जीएसटी छापे व्यापारी और उद्योग जगत में चर्चा का विषय बने हुए हैं। लेकिन इस बार राजपूत, ओबीसी खासकर प्रजापति समाज और दलित समाज में भाजपा को हो रहा नुकसान भाजपा पर भारी पड़ता दिख रहा है। समाजवादी पार्टी-कांग्रेस के टिकट पर लड़ रहे हरेंद्र मलिक उन्हें टक्कर दे रहे हैं। संजीव की बालियान खाप के मुकाबले वे अपनी गठवाला खाप के समर्थन पर भरोसा जता रहे हैं। तीन बार विधायक रह चुके सियासत के पुराने खिलाड़ी हरेंद्र राज्यसभा के सदस्य भी रह चुके हैं। उनके पुत्र पंकज मलिक चरथावल से विधायक हैं। मलिक समर्थकों को मुस्लिम, जाट, त्यागी बिरादरी के समर्थन की आस है। इसके अलावा उनका मानना है कि भाजपा से नाराज राजपूत समाज भी उनसे जुड़ेगा। ओबीसी का एक वर्ग भी उन्हें मिलने की आस है। ऐसे में बसपा के उम्मीदवार दारा सिंह प्रजापति दलित वोट बैंक के साथ प्रजापति व अन्य पिछड़ा वर्ग के साथ मुस्लिम वोट में हिस्सेदारी तलाश रहे हैं। अगर मुस्लिम-दलित और ओबीसी गठजोड बनता है तो यह भाजपा पर भारी पडेगा। ऐसे में आसान जीत समझ रहे भाजपा नेताओं के लिए यह चुनाव बेहद मुश्किल भरा बनता जा रहा है।


