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*{उत्पन्ना एकादशी व्रत आज-सब प्रकार से सुखद जीवन के लिए गोमाता को हरा चारा खिलाएं}*
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*पद्म पुराण के मुताबिक श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को इस एकादशी की उत्पत्ति और इसके महत्व के बारे में बताया था. व्रतों में एकादशी को प्रधान और सब सिद्धियों को देने वाला माना गया है*
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*इसबार उत्पन्ना एकादशी पर कई मंगलकारी योग बन रहे हैं. इस शुभ अवसर पर जगत के पालनहार भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है. इस व्रत को करने से साधक की हर मनोकामना पूरी होती है. ऐसा माना जाता है कि उत्पन्ना एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा करने और कुछ नियमों का पालन करने से मनुष्य के जीवन में धन की कोई कमी नहीं रहती है. जो लोग आर्थिक समस्या से परेशान रहते हैं. इस व्रत के करने से उनकी सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं*
*मार्गशीर्ष माह में उत्पन्ना एकादशी के दिन तुलसी के पौधे के पास देसी घी का दीपक जलाएं और तुलसी के पौधे की आरती करें. ऐसा माना जाता है कि ऐसा करने से मनुष्य को हमेशा पैसों की कमी नहीं रहती है और जीवन की सभी आर्थिक परेशानियां दूर हो जाती हैं. मान्यता है कि एकादशी पर भगवान विष्णु का आशीर्वाद पाने के लिए नहाने के पानी में एक चुटकी हल्दी मिलाकर स्नान करें. स्नान के बाद पीले वस्त्र धारण करें. ऐसा करने से माना जाता है कि व्यक्ति पर भगवान विष्णु की कृपा बनी रहेगी. अगर करियर या कारोबार में बाधाएं आ रही हैं तो उत्पन्ना एकादशी के दिन भगवान विष्णु का केसर वाले दूध से अभिषेक करें. ऐसा करने से व्यक्ति के जीवन की सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं*
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*अगर किसी को विवाह संबंधी परेशानियां आ रही हैं तो उन्हें उत्पन्ना एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करते हुए केसर, हल्दी या चंदन से तिलक करना चाहिए. श्रीहरि को पीले फूल अर्पित करें. मान्यता है कि ऐसा करने से शीघ्र विवाह हो जाता है और कर्ज से मुक्ति के लिए उत्पन्ना एकादशी पर रवि वृक्ष पर जल चढ़ाएं और शाम के समय रवि वृक्ष के नीचे दीपक जलाएं. इन उपायों को करने से जो व्यक्ति कर्ज से जूझ रहा है उसे जल्द ही कर्ज से मुक्ति मिल जाएगी*
*यह है उत्पन्ना एकादशी से जु़ड़ी पौराणिक व्रत कथा:*
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*श्रीमद्भागवत के अनुसार, सूतजी कहते हैं- हे ऋषियों! इस व्रत का वृत्तांत और उत्पत्ति प्राचीनकाल में भगवान कृष्ण ने अपने परम भक्त युधिष्ठिर से कही थी. वही मैं तुमसे कहता हूँ. एक समय युधिष्ठिर ने भगवान से पूछा था कि एकादशी व्रत किस विधि से किया जाता है और उसका क्या फल प्राप्त होता है. उपवास के दिन जो क्रिया की जाती है आप कृपा करके मुझसे कहिए. यह वचन सुनकर श्रीकृष्ण कहने लगे- हे युधिष्ठिर! मैं तुमसे एकादशी के व्रत का माहात्म्य कहता हूँ, सुनो…*
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*भगवन कहने लगे- हे युधिष्ठिर! सतयुग में मुर नाम का दैत्य उत्पन्न हुआ. वह बड़ा बलवान और भयानक था. उस प्रचंड दैत्य ने इंद्र, आदित्य, वसु, वायु, अग्नि आदि सभी देवताओं को पराजित करके भगा दिया. तब इंद्र सहित सभी देवताओं ने भयभीत होकर भगवान शिव से सारा वृत्तांत कहा और बोले हे कैलाशपति! मुर दैत्य से भयभीत होकर सब देवता मृत्यु लोक में फिर रहे हैं. तब भगवान शिव ने कहा- हे देवताओं! तीनों लोकों के स्वामी, भक्तों के दु:खों का नाश करने वाले भगवान विष्णु की शरण में जाओ. वे ही तुम्हारे दु:खों को दूर कर सकते हैं. शिवजी के ऐसे वचन सुनकर सभी देवता क्षीरसागर में पहुँचे. वहाँ भगवान को शयन करते देख हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे. इंद्र बोले- भगवन! प्राचीन समय में एक नाड़ीजंघ नामक राक्षस था, उसके महापराक्रमी और लोकविख्यात मुर नाम का एक पुत्र हुआ. उसकी चंद्रावती नाम की नगरी है. उसी ने सब देवताअओं को स्वर्ग से निकालकर वहाँ अपना अधिकार जमा लिया है. उसने इंद्र, अग्नि, वरुण, यम, वायु, ईश, चंद्रमा, नैऋत आदि सबके स्थान पर अधिकार कर लिया है. सूर्य बनकर स्वयं ही प्रकाश करता है. स्वयं ही मेघ बन बैठा है और सबसे अजेय है. हे असुर निकंदन! उस दुष्ट को मारकर देवताओं को अजेय बनाइए*.
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*यह वचन सुनकर भगवान ने कहा- हे देवताओं, मैं शीघ्र ही उसका संहार करूँगा. तुम चंद्रावती नगरी जाओ. इस प्रकार कहकर भगवान सहित सभी देवताओं ने चंद्रावती नगरी की ओर प्रस्थान किया. उस समय दैत्य मुर सेना सहित युद्धभूमि में गरज रहा था. उसकी भयानक गर्जना सुनकर सभी देवता भय के मारे चारों दिशाओं में भागने लगे. जब स्वयं भगवान रणभूमि में आए तो दैत्य उन पर भी अस्त्र, शस्त्र, आयुध लेकर दौड़े. भगवान ने उन्हें सर्प के समान अपने बाणों से उन्हें बींध डाला. बहुत-से दैत्य मारे गए. केवल मुर बचा रहा. वह अविचल भाव से भगवान के साथ युद्ध करता रहा. भगवान जो भी तीक्ष्ण बाण चलाते वह उसके लिए पुष्प सिद्ध होता. उसका शरीर छिन्नभिन्न हो गया किंतु वह लगातार युद्ध करता रहा. दोनों के बीच मल्लयुद्ध भी हुआ*
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*दस हजार वर्ष तक उनका युद्ध चलता रहा किंतु मुर नहीं हारा. थककर भगवान बद्रिकाश्रम चले गए. वहाँ हेमवती नामक सुंदर गुफा थी, उसमें विश्राम करने के लिए भगवान उसके अंदर प्रवेश कर गए. यह गुफा बारह योजन लंबी थी और उसका एक ही द्वार था. विष्णु भगवान वहाँ योगनिद्रा की गोद में सो गए*
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*मुर भी पीछे-पीछे आ गया और भगवान को सोया देखकर मारने को उद्यत हुआ तभी भगवान के शरीर से उज्ज्वल, कांतिमय रूप वाली देवी प्रकट हुई. देवी ने राक्षस मुर को ललकारा, युद्ध किया और उसे तत्काल मौत के घाट उतार दिया*
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*श्री हरि जब योगनिद्रा की गोद से उठे तो सब बातों को जानकर और प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने देवी से कहा कि चूंकि तुम्हारा जन्म मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की एकादशी को हुआ है, अत: आप उत्पन्ना एकादशी के नाम से पूजित होंगी. आज से प्रत्येक एकादशी को मेरे साथ तुम्हारी भी पूजा होगी*
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कर सकते हैं ये शुभ काम:
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*एकादशी पर शिव पूजा भी करनी चाहिए. शिवलिंग पर जल और दूध चढ़ाएं. बिल्व पत्र, हार-फूल, चंदन से श्रृंगार करें. किसी मंदिर में शिवलिंग के पास दीपक जलाएं और ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जप करें. बाल गोपाल का अभिषेक करें. तुलसी के साथ माखन-मिश्री का भोग लगाएं. धूप-दीप जलाएं और आरती करें. हनुमान जी के सामने दीपक जलाकर हनुमान चालीसा का पाठ करें*
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*एकादशी के दिन विष्णु जी पर जरूर चढ़ाएं ये चीज:*
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*भगवान विष्णु की कोई भी पूजा या भोग तुलसी के बिना पूरी नहीं होती है. ऐसे में एकादशी की पूजा में तुलसी को जरूर शामिल करें. अगर आप उत्पन्ना एकादशी का व्रत करने जा रहे हैं तो इस दिन भगवान विष्णु की तुलसी अर्पित करें. साथ ही प्रभु नारायण के भोग में भी तुलसी दल रखें. यहां बता दें कि एकादशी के दिन तुलसी में स्पर्श करना और जल अर्पित करना वर्जित है. तो ऐसे में एकादशी की पूजा के लिए एक दिन पहले ही तुलसी तोड़कर रख लें*
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*{जय गोमाता ,जय गोपाल}*
* उत्पन्ना एकादशी पर्व है जी*
*????हरे चारे की सेवा में अपना अंशदान शामिल करें जी।*
*आपका नाम ,जन्मस्थान एवं गोत्र लिखें*
*【सेवा भेजने के लिए पेटीएम/गूगल पे/फोन पे-8791423605】*
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