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अपनी जड़ों को याद कर पितरों का करें सम्मान : स्वामी श्रीभगवान आश्रम महाराज

मुजफ्फरनगर। दिव्य ध्यान योग आश्रम के संचालक स्वामी श्रीभगवान आश्रम महाराज ने पितृ पक्ष के अवसर पर श्रद्धा, तर्पण और पितरों के सम्मान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि श्राद्ध केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने का माध्यम है।
स्वामी श्रीभगवान आश्रम महाराज ने कहा कि हिंदू धर्म में श्राद्ध की परंपरा अत्यंत महत्वपूर्ण मानी गई है। ‘श्राद्ध’ शब्द ‘श्रद्धा’ से बना है, जिसका अर्थ पूरे विश्वास और सम्मान के साथ किसी कार्य को करना है। हिंदू मान्यता के अनुसार श्राद्ध के माध्यम से हम अपने पूर्वजों को याद करते हैं और उनके प्रति अपना कर्तव्य निभाते हैं।
उन्होंने कहा कि मनुष्य के जीवन में माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी तथा अन्य पूर्वजों का विशेष योगदान होता है। परिवार और समाज के निर्माण में उनके योगदान को कभी नहीं भूलना चाहिए। पितृ पक्ष हमें अपनी जड़ों से जुड़ने और पूर्वजों की स्मृतियों को संजोने का अवसर प्रदान करता है।
स्वामी श्रीभगवान आश्रम महाराज ने बताया कि पितृ पक्ष में परिवार के लोग अपने पूर्वजों की तिथि के अनुसार श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान आदि धार्मिक कार्य करते हैं। कई लोग पवित्र नदियों, तीर्थस्थलों अथवा अपने घर पर भी विधि-विधान से पितरों का स्मरण करते हैं। इस दौरान ब्राह्मणों, जरूरतमंदों तथा अन्य लोगों को भोजन कराने की भी परंपरा है।
उन्होंने कहा कि श्राद्ध की विधि परिवार, क्षेत्र और परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है, लेकिन इसका मूल भाव श्रद्धा और कृतज्ञता ही है। पितृ पक्ष केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमें अपने परिवार की जड़ों और संस्कारों से जोड़ने का अवसर देता है।
स्वामी जी ने कहा कि आज के आधुनिक दौर में परिवारों में बहुत परिवर्तन आया है, लेकिन श्राद्ध की परंपरा आज भी अनेक परिवारों में श्रद्धापूर्वक निभाई जाती है। लोग अपनी पारिवारिक और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितरों का स्मरण करते हैं। यह परंपरा नई पीढ़ी को अपने पूर्वजों, परिवार और संस्कारों के प्रति सम्मान की भावना सिखाती है।
उन्होंने कहा कि श्राद्ध के अवसर पर दान और जरूरतमंदों की सहायता करने की परंपरा भी रही है। भोजन, वस्त्र अथवा अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्य वस्तुओं का दान समाज में सहयोग और मानवता की भावना को मजबूत करता है। जरूरतमंद की सहायता करना भी सेवा का महत्वपूर्ण रूप है।
अंत में स्वामी श्रीभगवान आश्रम महाराज ने कहा कि श्राद्ध भारतीय संस्कृति की ऐसी परंपरा है, जो हमें अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की प्रेरणा देती है। यह परिवार की परंपराओं, संस्कारों और अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश देती है। श्राद्ध के माध्यम से हम अपने पूर्वजों का सम्मान करते हैं और आने वाली पीढ़ियों को भी अपने संस्कारों से जोड़ते हैं।

Taja Report
Author: Taja Report

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