मुजफ्फरनगर। पेपर उद्योगों एव इस तरह के अन्य उद्योगों में प्रदूषण मानकों के कड़ाई से अनुपालन, प्रभावी निगरानी व्यवस्था की जरूरत है।
पीजेंट के चेयरमैन अशोक बालियान ने उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखते हुए कहा है कि वर्तमान में जनपद मुजफ्फरनगर के पेपर उद्योगों में अपशिष्ट-व्युत्पन्न ईंधन (Refuse Derived Fuel – RDF) के प्रयोग को लेकर भी जन-चिंता सामने आ रही है।
आरोप हैं कि कुछ इकाइयों में आरडीएफ का प्रयोग निर्धारित पर्यावरणीय मानकों, स्वीकृत तकनीक और उत्सर्जन नियंत्रण नियमों के अनुरूप नहीं किया जा रहा है, जिससे वायु प्रदूषण बढ़ने की आशंका है।
आरडीएफ (Refuse-Derived Fuel) के प्राथमिक घटकों में प्लास्टिक, कपड़ा (टेक्सटाइल), और रबर शामिल होते हैं, साथ ही कागज, गत्ता, और अन्य ज्वलनशील गैर-पुनर्चक्रण योग्य सामग्री भी होती है, जिन्हें छांटकर, काटकर और सुखाकर ईंधन बनाया जाता है, जो कोयले जैसे जीवाश्म ईंधन का विकल्प होता है।
जनपद मुजफ्फरनगर में जन-चिंता व आक्रोश की यह स्थिति मुख्यतः संबंधित विभागीय अधिकारियों द्वारा नियमित निगरानी, प्रभावी नियंत्रण और मानकों के सख्त अनुपालन में लापरवाही के चलते उत्पन्न हो रही है। हालांकि जनपद मुजफ्फरनगर सहित उत्तर प्रदेश के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में संचालित पेपर उद्योग प्रदेश की अर्थव्यवस्था, रोजगार सृजन एवं औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि आरडीएफ का उपयोग केवल स्वीकृत तकनीक, निर्धारित गुणवत्ता मानकों और सख्त निगरानी व्यवस्था के अंतर्गत ही किया जाना चाहिए। इसके लिए राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा नियमित निरीक्षण, ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम, सैंपलिंग एवं कड़ी दंडात्मक कार्रवाई आवश्यक है। यदि पेपर और पल्प (लुगदी) जैसे अत्यधिक प्रदूषणकारी उद्योगों के लिए पर्यावरण विशेषज्ञों की नियुक्ति और एक समर्पित पर्यावरण प्रबंधन सेल (Environmental Cell) का गठन अनिवार्य है, तो यह अविलम्ब होना चाहिए।
वायु (Emissions) प्रदूषण एवं कार्य-जल (Wastewater) मानकों की नियमित, वैज्ञानिक और पारदर्शी निगरानी न होने से प्रदूषण का स्तर बढ़ता है, आम जनता में उद्योगों के प्रति नकारात्मक धारणा बनती जा रही है। यह स्थिति न तो उद्योगों के हित में है और न ही प्रदेश के सतत विकास के लिए अनुकूल।
जनपद मुजफ्फरनगर के कई पेपर उद्योगों से निकलने वाली राख (Fly Ash / Bottom Ash) का उचित प्रबंधन न होने के कारण यह राख वातावरण में फैलकर आसपास के रिहायशी क्षेत्रों में नीचे गिरती है। परिणामस्वरूप स्थानीय निवासियों के कपड़े काले हो जाते हैं, घरों की छतों, आंगनों व दीवारों पर राख जम जाती है, जिससे निरंतर गंदगी बनी रहती है।
यह राख हवा के माध्यम से सूक्ष्म कणों (Particulate Matter – PM) के रूप में वातावरण में घुलकर वायु प्रदूषण को और अधिक गंभीर बनाती है। इससे दमा, एलर्जी, आंखों में जलन, सांस संबंधी बीमारियों एवं अन्य स्वास्थ्य समस्याओं की आशंका बढ़ जाती है, जिसका सीधा प्रभाव बच्चों, बुजुर्गों एवं महिलाओं पर पड़ रहा है।
यह स्थिति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि कुछ इकाइयों में चिमनियों, ESP, Bag Filter, Ash Handling System एवं राख के सुरक्षित निस्तारण की व्यवस्था या तो अपर्याप्त है या उसका सही संचालन नहीं किया जा रहा है।
आवश्यकता इस बात की है कि संबंधित विभागीय अधिकारी अपने दायित्वों का पूरी जिम्मेदारी से निर्वहन करें तथा पर्यावरण संरक्षण और औद्योगिक विकास के बीच संतुलन स्थापित किया जाए।
इस संदर्भ में निम्न नीतिगत सुझाव सादर प्रस्तुत हैं—
1. पेपर उद्योगों में कार्यरत ETP, STP एवं वायु प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों की नियमित तकनीकी जांच एवं थर्ड पार्टी ऑडिट की व्यवस्था की जाए।
2. अपशिष्ट जल के नियमित बायो-एस्से (Bio-assay) परीक्षण अनिवार्य किए जाएं, जिससे पर्यावरणीय सुरक्षा सुनिश्चित हो।
3. अपशिष्ट-व्युत्पन्न ईंधन (RDF) का प्रयोग केवल स्वीकृत तकनीक, निर्धारित गुणवत्ता मानकों एवं सख्त निगरानी के अंतर्गत ही कराया जाए।
4. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा ऑनलाइन रियल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम को प्रभावी रूप से लागू कर डेटा सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कराया जाए।
5. मानकों के उल्लंघन पर निष्पक्ष, समयबद्ध एवं पारदर्शी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, जिससे ईमानदार उद्योगों को अनावश्यक बदनामी न झेलनी पड़े।
6. उद्योग प्रबंधन, प्रशासन एवं स्थानीय जनप्रतिनिधियों के बीच नियमित समन्वय बैठकें आयोजित की जाएं।
7. पेपर उद्योगों में बैग-फिल्टर, ESP एवं चिमनियों की क्षमता का तत्काल ऑडिट कराया जाए।
8. राख के पूरी तरह बंद (Covered) संग्रहण, परिवहन एवं निस्तारण को अनिवार्य किया जाए।
9. वायु में उड़ने वाली राख रोकने हेतु डस्ट सप्रेशन सिस्टम एवं ग्रीन बेल्ट विकसित की जाए।
10. रिहायशी क्षेत्रों के पास स्थित उद्योगों में PM10 व PM2.5 की रियल-टाइम मॉनिटरिंग लागू की जाए।
11. जिन इकाइयों से राख गिरने की शिकायतें सिद्ध हों, वहां तत्काल सुधारात्मक कार्रवाई व जुर्माना लगाया जाए।
12. स्थानीय प्रशासन द्वारा जन-सुनवाई एवं शिकायत निवारण तंत्र सक्रिय किया जाए।
माननीय मुख्यमंत्री जी, यदि उपरोक्त सुझावों पर प्रभावी ढंग से अमल किया जाए, तो उद्योग भी सुचारु रूप से संचालित रहेंगे, प्रदूषण पर नियंत्रण होगा और जनता में उद्योगों के प्रति सकारात्मक विश्वास स्थापित होगा। इससे उत्तर प्रदेश में सतत एवं उत्तरदायी औद्योगिक विकास को नई दिशा मिलेगी।