*24 मार्च 2024 को होलिका दहन रात्रि 11 बजकर 13 मिनट के बाद सर्वश्रेष्ठ*
*24 मार्च 2024 को प्रातः 9 बजकर 55 मिनट से रात्रि 11 बजकर 13 मिनट तक रहेगी भद्रा :- पं० विनय शर्मा*
पितृशक्ति एवं सुख समृद्धि हेतु मनोकामना पूर्ति के लिए हर्षोल्लास से भरा पावन पर्व होली एक धार्मिक एवं सामाजिक पर्व है । यह एक प्रकार से वैदिक यज्ञ भी है। इस पर्व में वर्ण और जाति-भेद का कोई विचार नही होता। यह पर्व तांत्रिकों के लिए भी विशेष पर्व है। भक्त प्रहलाद से तो इसका सम्बंध जोडा जाता है। लेकिन इस पर्व का ” कामदहन” से भी विशेष सम्बंध है। क्योंकि भगवान शंकर ने इसी दिन कामदेव को भस्म किया था। इसी कारण इस दिन महिलाएँ व पुरूष आपस में निःसंकोच होली खेलते है और हंसी-ठिठौली कर लेते है । इसी दिन मनु भगवान की भी पूजा की जाती है क्योंकि फाल्गुन मास की पूर्णमासी के दिन मनु भगवान का भी जन्म हुआ था। होली उत्सव मनाने से पापों का नाश होता है और मनोकामनाए पूर्ण होती है । मुजफ्फरनगर में भोपा रोड पर गैमक्सीन फैक्ट्री के निकट स्थित धार्मिक संस्थान विष्णुलोक के संचालक पं० विनय शर्मा ने बताया कि इस वर्ष 24 मार्च 2024 को होली का पावन पर्व है। 24 मार्च 2024 को दिन में होलिका पूजन, प्रातः 11:37 से दोपहर 12:24 के बीच अभिजित मुहूर्त में किया जाए तो विशेष फलदायी रहेगा और इस वर्ष 24 मार्च 2024 को होलिका दहन रात्रि 11 बजकर 13 मिनट के बाद किया जाए तो अत्यन्त श्रेष्ठ रहेगा क्योंकि 24 मार्च 2024 को प्रातः 9 बजकर 55 मिनट से रात्रि 11 बजकर 13 मिनट तक भद्रा रहेगी। भद्रा काल में होलिका दहन करना अशुभ माना जाता है । विष्णु लोक के संचालक पं० विनय शर्मा ने बताया कि खेतो में से नयी गेहूं की बाल लाकर होलिका अग्नि में उसे भूनकर उसके दाने बांटकर खाये जाते है । उस अन्न को होला कहते है । इस कारण से भी इस पर्व का नाम होलिकोत्सव पडा । शास्त्रों में यह भी उल्लेख है कि फाल्गुनी पूर्णिमा वाले दिन हिंडौले में झूलते हुए भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन से बैकुंठलोक की प्राप्ति होती है । जलती होली की परिक्रमा करने से हमारे शरीर में कम से कम 140 फॉरेनहाइट गर्मी प्रविष्ट हो जाती है और शरीर की उस गर्मी से शरीर में रोग उत्पन्न करने वाले जीवाणु नष्ट हो जाते है । पं0 विनय शर्मा ने बताया कि पितृ शान्ति, अनेको रोग-शोक, टोने-टोटको के निवारण के लिए बाजार से एक सूखा खाने वाला तेल वाला गोला लाए और उसे ऊपर से काटकर उसमें काले तिल भर ले । तिल भरने के उपरान्त गोले के कटे हुए टुकडे को पुनः गोले पर रखकर कलावा बांध दे और इस गोले को नदी में बहा दे तथा पीछे से एक चांदी का नाग (सर्प) भी बहा दें, और चुपचाप घर वापस आ जाये ।


