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1947: बंटवारे के जख्मों पर मरहम की जरुरत

पाकिस्तान के बंटवारे का आधार मजहब था-अशोक बालियान,चेयरमैन,पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन

भारत का विभाजन धार्मिक आधार (मजहब के आधार) पर और देश में दो प्रांतों के विभाजन पर आधारित हुआ था। ब्रिटिश पॉर्लियामेंट ने 15 जुलाई, 1947 को ‘इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट’ पारित किया था। इस कानून के तहत सिर्फ एक माह बाद यानी 15 अगस्त, 1947 को ‘ब्रिटिश भारत के प्रांतों’ को दो सार्वभौम प्रभुसत्ता संपन्न देशों के बीच विभाजित किया जाना था। एक का प्रस्तावित नाम ‘यूनियन ऑफ इंडिया’ और दूसरे का ‘डोमिनियन ऑफ पाकिस्तान’ था। स्वतंत्र पाकिस्तान 14 अगस्त को अस्तित्व में आ गया था। भारत में 15 अगस्त को लाल किले पर तिरंगा फहराया गया था। भारत में विभाजन की घोषणा भारत के अंतिम वायसराय जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने की थी।ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने तब भारतीय उपमहाद्वीप से ब्रिटिश साम्राज्य की वापसी का निरीक्षण किया था।

यह एक ऐतिहासिक विरोधाभास था कि जिस तारीख को पाकिस्तान अस्तित्व में आया, उस दिन तक उस देश की सीमाएं तय नहीं हो पाई थीं। भारत से अलग हुए लगभग साढ़े चार लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को लगभग आठ करोड़ लोगों के लिए आबंटित किया जाना था, जिसका नाम पाकिस्तान रखा गया था।

इस विभाजन के लिए मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्हा प्रमुख रूप से जिम्मेदार थे। ऐतिहासिक तौर पर मुस्लिम लीग का सांस्कृतिक और राजनीतिक केंद्र स्थल उत्तरप्रदेश में था, जहां लीग सबसे ज्यादा मजबूत स्थिति में थी, पंजाब और बंगाल में, जो भारत के संपन्नतम प्रांत थे और एक दूसरे से काफी दूर स्थित थे, मुसलमान बहुसंख्यक थे। पंजाब में उनका संख्याबल जरा ही अधिक था, मगर बंगाल में अधिक मजबूत था। इन दोनों ही प्रांतों में लीग की बहुत प्रभावशाली शक्ति नहीं थी। पंजाब में वह नगण्य थी। यूनियनिस्ट पार्टी जिसका पंजाब प्रांत पर नियंत्रण था, बड़े मुस्लिम जमींदारों और संपन्न हिंदू जाट किसानों का गठबंधन था।

सन 1941 में कराची (पाकिस्‍तान की पहली राजधानी) में 46.7 फीसदी आबादी हिंदू थी, जिसने विभाजन के दौरान या तुरंत बाद शहर छोड़ दिया था। लगभग इसी समय, दिल्ली की पूरी आबादी में एक तिहाई मुसलमान शामिल थे, जिनमें से अधिकांश सन 1947 में विस्थापित हो गए थे। जब भारत का बंटवारा हुआ, तो देश में मुसलमानों की आबादी क़रीब 10 करोड़ थी। बंटवारे के बाद इसमें से लगभग एक तिहाई मुसलमान, भारत में ही रह गए थे। वो देश के उन इलाक़ों में रहते थे, जो पाकिस्तान का हिस्सा नहीं बने थे। हालांकि इन मुसलमानों ने ज़ोर-शोर से पाकिस्तान बनाने का समर्थन किया था। भारत के मुसलमानों ने सन 1946 में हुए चुनाव के बाद अपनी प्राथमिकता जाहिर कर दी थी। पटेल और अंबेडकर ने इस आधे-अधूरे बंटवारे की भरपूर आलोचना की थी।

भारत-पाक विभाजन से पहले ब्रिटिश इंडिया में 17 प्रान्त हुआ करते थे।आजादी के दो दिन बाद दोनों देशों के बीच विभाजन रेखा खींची गई थी। ब्रिटिश वकील सर सिरिल रैडक्लिफ ने यह लाइन तैयार की थी, इसलिए इसे रैडक्लिफ लाइन भी कहा जाता है।

आंकड़ों से पता चलता है कि ‘इस खूनी विभाजन’ के दौरान लगभग 1.5 करोड़ लोग अपने घरों से विस्थापित हो गए थे, विभाजन के बाद हुए सांप्रदायिक दंगों में दस लाख से अधिक लोगों की हत्या कर दी गई थी और बड़ी संख्या में महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया था। और बच्चों को उनके परिवारों के सामने मार दिया गया था।

पाकिस्तान में बसे हिंदुओं के हालात सबसे खराब हैं। वे लगातार हिंदुस्तान लौट रहे हैं। पाकिस्तान में माइनॉरिटी पर काम करने वाली संस्था ऑल पार्टी पार्लियामेंट्री ग्रुप (APPG) ने एक रिपोर्ट में बताया था कि हर साल कम से कम 1,000 हिंदू लड़कियों का धर्म बदलकर उनकी शादी करा दी जाती है। वहां पर 12 से 25 साल की ये बच्चियां-औरतें अक्सर अपने से दोगुने-तिगुने उम्र के आदमियों से जबरन ब्याह दी जाती हैं। और न मानने पर धमकी, रेप और मारपीट आम बात है।

भारत में सन 1990 के दौर कश्मीर राज्य में भी कुछ ऐसा ही हुआ था। कश्मीर कभी हिंदू बहुल क्षेत्र हुआ करता था।फिर धीरे-धीरे वहां धार्मिक समीकरण बदलने लगे थे और उस वक्त वहां नरसंहार में हजारों पंडितों का कलेआम हुआ था। बड़ी संख्या में महिलाओं और लड़कियों के साथ बलात्कार हुए थे। आज वहां से हिन्दू भगा दिए गए है। कश्मीर में हिन्दुओं पर हमलों का सिलसिला सन 1989 में जिहाद के लिए गठित जमात-ए-इस्लामी ने शुरू किया था। हम अपने एक ऐसे देश में रहते हैं, जहां के कई हिस्सों से ही हिन्दुओं को बेदखल किये जाने का क्रम जारी है, साथ ही उहीं के उपसंप्रदायों को गैर-हिन्दू घोषित कर उहें आपस में बांटे जाने की साजिश भी जारी है।। पिछले 70 साल में हिन्दू अपने ही देश भारत के 8 राज्यों में अल्पसंख्यक हो चला है।

हमारा मानना है इस बंटवारे को लेकर हर मंच पर एक बहस तो होनी ही चाहिए। आज भी 75 साल बाद हम वहीं आकर खडे हैं, जब देश के भीतर भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी से सुनते हैं कि हम यहां सुरक्षित नहीं है, तो क्या उन्हें फिर से एक ओर पाकिस्तान बनाकर दिया जाये। इस पर चर्चा होनी ही चाहिए, क्योंकि बिना इस पर चर्चा के यह समस्या का समाधान नहीं होने वाला है।

कांग्रेस के नेता राहुल गाँधी अमेठी से पराजित हुए, तो वायनाड जो मुस्लिम बहुल वाला क्षेत्र है, वहां से जीतकर आज मुस्लिम तुष्टीकरण करने में इतना आगे निकल रहे हैं कि वह सनातन धर्म को अपने ही सहयोगियों से गाली दिलवा रहे हैं और मौन होकर उनका समर्थन भी कर रहे हैं। मुस्लिम पर्सनल लॉ, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, वक्फ बोर्ड, वक्फ सम्पत्ति कानून, विदेशी इस्लामिक हमलावरों को महिमामंडित करना व् पूजास्थल कानून जैसे कार्य तुष्टिकरण की दिशा में कांग्रेस ने उठाए थे।

कांग्रेस व् राहुल गाँधी को पता होना चाहिए कि राष्ट्र एक राजनीतिक संकल्पना है, देश एक सामाजिक संकल्पना है, राज्य एक प्रशासनिक संकल्पना हैं। इसमें तुष्टीकरण नहीं होना चाहिए। धर्म और इतिहास के घटकों पर अगर हम गंभीरता से विचार करें तो हम ये पाएंगे कि यह आदमी के दिल और दिमाग को कड़वा बना देता है। हमें प्रयास इस बात की करनी चाहिए कि दूसरे के धर्म के प्रति आदर और समझ-बूझ पैदा हो।

वर्तमान परिस्थितियों को देखा जाए और उनका विश्लेषण किया जाये तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि देश के लिए मोदी जरूरी है।क्योकि जिन समस्याओं को देश की विभिन्न सरकारों ने आजादी के बाद से अबतक लटकाए रखा था, उन सभी समस्याओं का समाधान मोदी सरकार ने प्राथमिकता के तौर पर किया है।

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Author: Taja Report

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