मुजफ्फरनगर। थाना ककरौली पुलिस ने युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले एक बड़े संगठित गिरोह का पर्दाफाश किया है। पुलिस ने फर्जी डिप्लोमा, प्रमाण-पत्र और मार्कशीट तैयार कर बेचने वाले गिरोह के 10 शातिर आरोपियों को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की है। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक संजय कुमार वर्मा के निर्देशन में की गई इस बड़ी कार्रवाई में पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से भारी मात्रा में फर्जी दस्तावेज, कंप्यूटर, प्रिंटर, लेमिनेशन मशीन और मोबाइल फोन समेत इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बरामद किए हैं।
पुलिस के अनुसार, ककरौली थाना पुलिस जटवाड़ा चौकी क्षेत्र में संदिग्ध वाहनों और व्यक्तियों की चेकिंग कर रही थी। इसी बीच मुखबिर से सटीक सूचना मिली कि फर्जी दस्तावेज तैयार करने वाले कुछ शातिर अपराधी नहर पटरी के पास मौजूद हैं। पुलिस ने तुरंत घेराबंदी कर मौके से पांच आरोपियों को दबोच लिया। इनसे सख्ती से की गई पूछताछ के आधार पर पुलिस टीम ने फौरन मेरठ का रुख किया और वहां के न्यूटिमा हॉस्पिटल व हिम्स हॉस्पिटल से गिरोह से जुड़े पांच अन्य आरोपियों को भी गिरफ्तार कर लिया। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक संजय कुमार वर्मा ने बताया कि यह गिरोह पिछले डेढ़ साल से सक्रिय था। इनके तार गहरे जुड़े हैं, जिसे देखते हुए इस पूरे फर्जीवाड़े की गहन जांच के लिए एक विशेष एसआईटी टीम का गठन किया जा रहा है।ककरौली थाने में आरोपियों के खिलाफ संबंधित गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर जेल भेजने की कार्रवाई की जा रही है। पुलिस पूछताछ में एक और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि इस गिरोह ने बिना किसी वास्तविक पढ़ाई या डिप्लोमा के कई महिलाओं और युवकों को देश के विभिन्न राज्यों में नर्सिंग केयर के पदों पर नौकरियां भी दिलवाई थीं। शुरुआती जांच में उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों में भी एक दर्जन से अधिक लोगों के इस फर्जी सर्टिफिकेट के सहारे नौकरी पाने की बात सामने आई है, जिसकी जांच अब पुलिस की एसआईटी टीम करेगी।पुलिस पड़ताल में सामने आया कि यह गिरोह पिछले करीब डेढ़ वर्ष से फर्जी नर्सिंग एवं मिडवाइफरी डिप्लोमा, रजिस्ट्रेशन प्रमाण-पत्र और मार्कशीट धड़ल्ले से तैयार कर रहा था। शातिरों का नेटवर्क इतना मजबूत था कि वे इन फर्जी कागजातों पर बकायदा ‘क्यूआर कोड’ भी लगाते थे, ताकि जांच के दौरान ये दस्तावेज पहली नजर में बिल्कुल असली प्रतीत हों। गिरोह के सदस्य इन दस्तावेजों को तैयार करने के एवज में पहले 4,000 रुपये लेते थे, जिन्हें बाद में आगे के एजेंटों के जरिए जरूरतमंद युवाओं को 25,000 रुपये प्रति दस्तावेज तक में बेचकर मोटी अवैध कमाई की जा रही थी।


