भोपाल। कोई हाथ भी ना मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से, ये नये मिजाज का शहर है जरा फासले से मिला करो।
जदीद उर्दू शायरी के शहनशाह और ऐसे शेरों से उर्दू अदब को नवाजने वाले डॉ बशीर बद्र नहीं रहे। व गुरुवार को बकरीद के दिन मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र का 91 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने भोपाल स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। वे मेरठ दंगों में घर जलने के बाद भोपाल चले गए थे।
आधुनिक गजल के लोकप्रिय और प्रभावशाली शायरों में गिने जाने वाले डॉ. बशीर बद्र लंबे समय से डिमेंशिया (स्मृतिलोप) की बीमारी से जूझ रहे थे। उनकी याददाश्त लगभग खत्म हो गयी थी। वे अपने करीबियों और परिचितों को भी पहचान नहीं पा रहे थे। पिछले कुछ महीनों से उनकी तबीयत लगातार बिगड़ रही थी और उनका अधिकांश समय घर में ही बीत रहा था। सहज भाषा के जरिए आम जिंदगी के एहसासों को गजल में ढालने वाले बशीर बद्र ने उर्दू साहित्य को नई ऊंचाई दी। उनके निधन की खबर से साहित्य जगत समेत लाखों प्रशंसकों में गहरा शोक व्याप्त है।

