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महाकालेश्वर और बारह ज्योतिर्लिंगों के इस अद्भुत सत्य को जानते हैं आप?

*{भगवान शंकर के तीसरे ज्योतिर्लिंग का विवरण)*

*महाकालेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग*

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*हम भगवान शिव (शंकर) के द्वादश (बारह) ज्योतिर्लिङ्गों में 3rd’ (तृतीय) महाकालेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग की महिमा के बारे में विवरण (ज्ञान) इस प्रकार है*

 

*महाकालेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग -हिंदुधर्म के पंचदेवों में भगवान शिव के 12 (द्वादश) ज्योतिर्लिंङ्गों में 3rd’ महाकाल (महाकालेश्वर) ज्योतिर्लिंङ्ग भारत के मध्यपश्चिम में मध्यप्रदेश के उज्जैन में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग स्थित है। कमाल की बात है कि महाकाल से भगवान शिव के अन्य ज्योतिर्लिङ्गों की दूरी का अद्भुत संबंध है। उज्जैन से शेष ज्योतिर्लिङ्गों की दूरी के रोचक तथ्य (दूरी) इस प्रकार है*-

सोमनाथ -777kM

मल्लिकार्जुन -999kM

ओंकारेश्वर -111kM

केदारनाथ -888kM

भीमाशंकर -666kM

विश्वनाथ -999kM

त्रयंबकेश्वर -555kM

बैद्यनाथ -999kM

रामेश्वरम -1999kM

घृष्णेश्वर -555kM

 

*सनातनधर्म में वर्षो से उज्जैन को पृथ्वी का केन्द्र माना जाता रहा है, इसलिये उज्जैन में सूर्य की गणना और ज्योतिष गणना के लिये मानवनिर्मित यंत्र भी करीब 2050वर्ष पहले बनाये गये हैं और करीब 100वर्ष पहले पृथ्वी पर काल्पनिक रेखा (कर्क) अंग्रेज वैज्ञानिक द्वारा बनाई गई, तो उसका मध्यभाग उज्जैन से ही निकला। आज भी वैज्ञानिक उज्जैन में सूर्य और अंतरिक्ष की जानकारी के लिये पहुंचते हैं।*

महाकालेश्वर मंदिर भारत के 12 ज्योतिर्लिङ्गों में से एक है। मध्यप्रदेश राज्य के उज्जैन नगर में स्थित महाकालेश्वर भगवान का प्रमुख मंदिर है। उज्जैयनी में महाकालेश्वर मंदिर की प्रतिष्ठा अनजाने काल से है। शिवपुराण के अनुसार नंद से आठ पीढ़ी पूर्व एक गोप बालक द्वारा महाकाल की प्रतिष्ठा हुई। महाकाल शिवलिंग के रुप में पूजे जाते हैं। महाकाल की निष्काम या निराकार रुप में पूजा होती है। सकल अथवा साकाररुप में उनकी नगर में सवारी निकलती है।

महाकालेश्वर मंदिर महान धार्मिक, पौराणिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, राजनैतिक नगरी उज्जैयनी जो विश्व के मानचित्र पर उत्तरवाहिनी क्षिप्रानदी के पूर्वीतट पर भूमध्यरेखा और कर्करेखा के मिलनस्थल पर, हरिशचंद्र की मोक्षभूमि, सप्तर्षियों की वर्णस्थली, महर्षि सांदीपनि की तपोभूमि, कृष्ण की शिक्षा स्थली, भर्तृहरि की योगस्थली, संवत प्रवर्त्तक सम्राट विक्रम की साम्राज्य राजधानी, महाकवि कालिदास की प्रियनगरी, विश्वप्रसिद्ध दैवज्ञ वराहमिहिर की जन्मभूमि, अवंतिका, कनकश्रृंगा, विशाला, पद्मावती, उज्जैयनी आदि नामों से समय-समय पर प्रसिद्धि पाती रही, जिसका अनेक पुराणों और धार्मिकग्रंथों में विस्तृत वर्णन भरा पड़ा है, ऐसे पवित्रतम सप्तपुरियों में श्रेष्ठ स्वयंभु महाकालेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग रुप में मणिपुरचक्र नाभिस्थल सिद्धभूमि उज्जैयनी में विराजमान हैं।

महाकाल वन में अधिष्ठित होने से उज्जैन का ज्योतिर्लिङ्ग भी महाकाल कहलाया अथवा महाकाल जिस वन में सुप्रतिष्ठित है, यह वन महाकाल के नाम से विख्यात हुआ। महाकाल के ज्योतिर्लिङ्ग की पूजा अनजाने काल से प्रचलित है और आज तक निरंतर जारी है। पुराणों में महाकाल की महिमा की चर्चा बारबार हुई है। शिवमहापुराण के अतिरिक्त स्कंदपुराण के अवंतीखंड में भगवान महाकाल का भक्तिभाव से भव्य प्रभामंडल प्रस्तुत हुआ है। जैन परंपरा में भी महाकाल का स्मरण विभिन्न संदर्भों में होता रहा है।

महाकवि कालिदास ने अपने रघुवंश और मेघदूत काव्य में महाकाल और उनके मंदिर का आकर्षण का भव्यरुप प्रस्तुत करते हुये उनकी सांध्यआरती उल्लेखनीय बताई। इस आरती की गरिमा रविंद्रनाथ ठाकुर ने भी रेखांकित किया था। महाकवि कालिदास ने जिस भव्यता से महाकाल का प्रभामंडल प्रस्तुत किया। प्राय: समस्त महत्वपूर्ण साहित्यकारों ने जब भी उज्जैन या मालवा को केन्द्र में रखकर कुछ भी रचना की तो महाकाल का ललित स्मरण अवश्य किया है। चाहे बाण हो अथवा पद्मगुप्त, राजशेखर हो अथवा श्री हर्ष, तुलसीदास हो अथवा रविंद्रनाथ टैगोर। बाणभट्ट के प्रमाण से ज्ञात होता है कि महात्माबुद्ध के समकालीन उज्जैन के राजा प्रद्योत के समय महाकाल का मंदिर विद्यमान था। कालिदास के द्वारा मंदिर का उल्लेख किया गया। पंचतंत्र, बाणभट्ट, कथा सरित्सागर से भी उस मंदिर की पुष्टि होती है।

महाकालेश्वर का पुराणों, महाभारत, कालिदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में इस मंदिर का मनोहर वर्णन मिलता है। स्वयंभु, भव्य, दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव की अत्यंत पुण्यदायी महत्ता है। इसके दर्शनमात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। महाकवि कालिदास ने मेघदूत में उज्जैयनी की चर्चा करते हुये इस मंदिर की प्रशंसा की है। इल्तुत्मिश के द्वारा 1235 ईस्वीं में इस प्राचीन मंदिर को विध्वंस किये जाने के बाद यहां जो भी शासक रहे, उन्होंने मंदिर के जीर्णोद्धार और सौन्दर्यीकरण की ओर विशेष ध्यान दिया, इसलिये मंदिर अपने वर्तमान स्वरुप को प्राप्त कर सका है। प्रतिवर्ष और सिंहस्थ के पूर्व इस मंदिर को सुसज्जित किया जाता है।

उज्जैन का प्राचीननाम उज्जैयनी है, यह भारत के मध्य में स्थित उसकी परंपरागत सांस्कृतिक राजधानी रही। यह चिरकाल तक भारत की राजनीतिक धुरी भी रही। इस नगरी का पौराणिक एवं धार्मिक महत्व सर्वज्ञात है। भगवान श्रीकृष्ण की यह शिक्षास्थली रही और महाकाल ज्योतिर्लिङ्ग इसकी गरिमा बढ़ाते हैं। आकाश में तारकलिंग, पाताल में हाटकेश्वर लिंग, पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है, जहां महाकाल स्थित है वही पृथ्वी का नाभि स्थान और धरा का केन्द्र है।

महाकालेश्वर मंदिर सर्वप्रथम कब निर्मित हुआ था, यह कहना कठिन है। निश्चित ही यह धर्मस्थल प्रागैतिहासिक देन हैं। पुराणों में संदर्भ आया है कि इसकी स्थापना प्रजापिता ब्रह्माजी के द्वारा हुई थी। ईसापूर्व छठी सदी में उज्जैन के एक वीर शासक चंडप्रद्योत ने महाकालेश्वर परिसर की व्यवस्था के लिये अपने पुत्र कुमारसेन को नियुक्त किया था। उज्जैयनी की चौथी और तीसरी सदी ईसापूर्व क़े कतिपय आहत सिक्कों पर महाकाल की प्रतिमा का अंकन हुआ है। प्राचीन काव्य ग्रंथों में महाकालेश्वर मंदिर का उल्लेख आया है।

राजपुताना युग से पूर्व उज्जैयनी में जो महाकाल मंदिर विद्यमान था, उस विषयक जो संदर्भ मिलते हैं, उनके अनुसार मंदिर बड़ा विशाल एवं दर्शनीय था। प्रारंभिक मंदिर काष्टस्तम्भों पर आधारित था। गुप्तकाल के पूर्व मंदिरों पर कोई शिखर नहीं होते थे और छत सपाट रहती थी। इसी कारण रघुवंश में महाकवि कालिदास ने इसे निकेतन की संज्ञा दी।

उज्जैन में 1107से 1728 ईस्वीं तक यवनों का शासन था, इनके शासनकाल में अवंती की लगभग 4500वर्षो में स्थापित हिंदुओं की प्राचीन धार्मिक परंपरायें प्राय: नष्ट हो चुकी थी, लेकिन 1690 ईस्वीं में मराठों ने मालवाक्षेत्र में आक्रमण कर दिया और 29 Nov 1728 को मराठा शासकों ने मालवाक्षेत्र में अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया। इसके बाद उज्जैन का खोया हुआ गौरव पुनः लौटा और 1731से 1809 तक यह नगरी मालवा की राजधानी बनी रही।

महाकालेश्वर मंदिर का पुनर्निर्माण और ज्योतिर्लिङ्ग की पुनः प्रतिष्ठा तथा सिंहस्थ पर्व स्नान की स्थापना, जो एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। राजाभोज ने इस मंदिर का विस्तार कराया।

महाकालेश्वर का जो विश्वप्रसिद्ध मंदिर आज विद्यमान है, यह राणोजी शिंदे शासन की देन है। यह 3खंडों में विभक्त है। निचले खंड में महाकालेश्वर, बीचखंड में ओंकारेश्वर, सर्वोच्चखंड में नागचंद्रेश्वर के शिवलिंग प्रतिष्ठित हैं। नागचंद्रेश्वर के दर्शन केवल नागपंचमी को ही होते हैं। मंदिर परिसर में जो विशालकुंड है, वह पवित्र कोटितीर्थ है। कोटितीर्थ सर्वतो भद्रशैली में निर्मित है। इसके 3तरफ लघु शैवमंदिर निर्मित हैं। कुंडसोपानों से जुड़ेमार्ग पर अनेक दर्शनीय परमारकालीन प्रतिमायें देखी जा सकती हैं, जो उस समय निर्मित मंदिर के कलात्मक वैभव का परिचय कराती है। कुंड के पूर्व में जो विशाल बरामदा है, वहां से महाकालेश्वर के गर्भगृह में प्रवेश किया जाता है। इसी बरामदे के उत्तरीछोर पर भगवान श्रीराम एवं देवी अवंतिका की आकर्षक पूज्य प्रतिमायें हैं। मंदिर एक परकोटे के भीतर स्थित है। गर्भगृह तक पहुंचने के लिये एक सीढ़ीदार रास्ता है। इसके ठीक उपर एक दूसराकक्ष है, जिसमें ओंकारेश्वर शिवलिंग स्थापित है।

मंदिर का क्षेत्रफल -10.77×10.77 वर्गमीटर और ऊंचाई -28.71 मीटर है।

महाशिवरात्रि एवं श्रावणमास के प्रत्येक सोमवार को इस मंदिर में अपारभीड़ होती है। मंदिर से लगा एक छोटा जलस्रोत है, जिसे कोटितीर्थ कहा जाता है। इल्तुत्मिश ने जब मंदिर को तुड़वाया, तब शिवलिंग को इसी कोटितीर्थ में फिकवा दिया था। बाद में इसकी पुनःप्रतिष्ठा करवाई गई। वर्ष1968 के सिंहस्थ महापर्व के पूर्व मुख्य द्वार का विस्तार कर सुसज्जित कर लिया गया था। इसके अलावा निकासी के लिये एक अन्यद्वार का भी निर्माण कराया गया था, लेकिन दर्शनार्थियों की अपार भीड़ को दृष्टिगत रखते हुये बिड़ला समूह द्वारा वर्ष1980 के सिंहस्थ के पूर्व एक विशालसभा मंडप का निर्माण कराया गया। महाकालेश्वर मंदिर की व्यवस्था के लिये एक प्रशासनिक समिति का गठन किया गया है, जिसके निर्देशन में यहां की व्यवस्था सुचारुरुप से चल रही है। हाल ही में इसके 118शिखरों पर 16किलो स्वर्ण की परत चढ़ाई गई है।

मंदिर में दान, दर्शन, प्रसाद के लिये इंटरनेट सुविधा भी है। अधिक दर्शनार्थियों के आने के कारण दिन प्रतिदिन मंदिर में निरंतर रुप से नये निर्माणकार्य और सुविधाओं को बढ़ाने के कार्य हो रहे हैं। ताकि दर्शनार्थियों को अत्यधिक लाभ मिल सके।

 

Taja Report
Author: Taja Report

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