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*????रक्षाबंधन की पौराणिक कथा-:*
*रक्षाबंधन की सामाजिक लोकप्रियता कब प्रारंभ हुई, यह कहना तो कठिन है। कुछ पौराणिक कथाओं में इसका जिक्र है जिसके अनुसार भगवान विष्णु के वामनावतार ने भी राजा बलि को रक्षासूत्र बांधा था।*
*एक पौराणिक कथानक के अनुसार वामन अवतार में ही माता लक्ष्मी ने भी राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधा था।*
*प्राचीन काल में देव असुर संग्राम के दौरान गुरु बृहस्पति व अन्य ऋषि गणों ने शक्ति के संचार हेतु मंत्रोचारित रक्षा सूत्र इंद्र के कलाई पर बांधा था जिसकी वजह से देवताओं ने असुरों से युद्ध करने की की सामर्थ्य पाई और विजय हुए। इस तरह से कई ऐसे कथानक है जिसमें रक्षा सूत्र का जिक्र आता है।*
*????रक्षा सूत्र का उद्देश्य :*
*मंत्र से यह अर्थ लिया जाता है कि दानवीर महाबली राजा बलि जिससे बांधे गए थे, उसी से तुम्हें बांधता हूं। हे रक्षे!(रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो। धर्मशास्त्र के विद्वानों के अनुसार इसका अर्थ यह है कि रक्षा सूत्र बांधते समय आचार्य अपने यजमान को कहता है कि जिस रक्षासूत्र से दानवों के महापराक्रमी राजा बलि धर्म के बंधन में बांधे गए थे अर्थात् धर्म में प्रयुक्त किए गये थे, उसी सूत्र से मैं तुम्हें बांधता हूं, यानी धर्म के लिए प्रतिबद्ध करता हूं। इसके बाद आचार्य रक्षा सूत्र से कहता है कि हे रक्षे तुम स्थिर रहना, स्थिर रहना। इस प्रकार रक्षा रक्षाबंधन पर्व व पूजा- हवन यज्ञ इत्यादि के दौरान रक्षा सूत्र बांधकर आचार्य द्वारा अपने यजमानों को धर्म के लिए प्रेरित एवं प्रयुक्त करना है।*
*रक्षाबंधन के दिन बहन अपने भाई के कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उसके यश- मान व आयुष की कामना करती है और भाई उसकी रक्षा का संकल्प लेता है।*
*रक्षाबंधन में मूलत: दो भावनाएं काम करती रही हैं। प्रथम जिस व्यक्ति के रक्षाबंधन किया जाता है उसकी कल्याण कामना और दूसरे रक्षाबंधन करने वाले के प्रति स्नेह भावना। इस प्रकार रक्षाबंधन वास्तव में स्नेह, शांति और रक्षा का बंधन है। इसमें सबके सुख और कल्याण की भावना निहित है। सूत्र का अर्थ धागा भी होता है और सिद्धांत या मंत्र भी। पुराणों में देवताओं या ऋषियों द्वारा जिस रक्षासूत्र बांधने की बात की गई हैं वह धागे की बजाय कोई मंत्र या गुप्त सूत्र भी हो सकता है। धागा केवल उसका प्रतीक है*
*????रक्षासूत्र (मौली) बांधने का मंत्र-:*
*‘येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबल:।*
*तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।’*
*येन=जिसके द्वारा बद्धो= प्रतिबद्ध हुए, बली राजा= राजा बलि, दानवेन्द्रो=दानवों के राजा, महाबल: = महाबलशाली, तेन= उसी प्रतिबद्धता के सूत्र द्वारा त्वाम=तुम्हे अनुबध्नामि = मैं भी उसी रक्षा सूत्र मे बनाता हूँ, रक्षे=हे रक्षा सूत्र, मा चल=स्थिर रहो मा चल=स्थिर रहो, चलायमान मत रहो।*
*अर्थ-: अर्थ यह है कि रक्षा सूत्र बांधते समय आचार्य अपने यजमान को कहता है कि जिस रक्षासूत्र से दानवों के महापराक्रमी राजा बलि धर्म के बंधन में बांधे गए थे अर्थात् धर्म में प्रयुक्त किए गये थे, उसी सूत्र से मैं तुम्हें बांधता हूं, यानी धर्म के लिए प्रतिबद्ध करता हूं। इसके बाद आचार्य रक्षा सूत्र से कहता है कि हे रक्षे तुम स्थिर रहना, स्थिर रहना। इस प्रकार रक्षा सूत्र का उद्देश्य आचार्यों ब्राह्मणों द्वारा अपने यजमानों को धर्म के लिए प्रेरित एवं प्रयुक्त करना है। यह रक्षा सूत्र धर्म अर्थात कर्तव्य पालन के लिए समर्पित है।*
*????मौली का अर्थ :-*
*’मौली’ का शाब्दिक अर्थ है ‘सबसे ऊपर’। मौली का तात्पर्य सिर से भी है। मौली को कलाई में बांधने के कारण इसे कलावा भी कहते हैं। इसका वैदिक नाम उप मणिबंध भी है। मौली के भी प्रकार हैं। शंकर भगवान के सिर पर चन्द्रमा विराजमान है इसीलिए उन्हें चंद्रमौली भी कहा जाता है।*
*????कैसी होती है मौली.? -:*
*मौली कच्चे धागे (सूत) से बनाई जाती है जिसमें मूलत: 3 रंग के धागे होते हैं- लाल, पीला हरा, लेकिन कभी-कभी यह 5 धागों की भी बनती है जिसमें नीला और सफेद भी होता है। 3 और 5 का मतलब कभी त्रिदेव के नाम की, तो कभी पंचदे
*????मौली बांधने के नियम :-*
*शास्त्रों के अनुसार पुरुषों एवं अविवाहित कन्याओं को दाएं हाथ में कलावा बांधना चाहिए। विवाहित स्त्रियों के लिए बाएं हाथ में कलावा बांधने का नियम है। कलावा बंधवाते समय जिस हाथ में कलावा बंधवा रहे हों, उसकी मुट्ठी बंधी होनी चाहिए और मुट्ठी में चावल के दाने व दक्षिणा होनी चाहिए और दूसरा हाथ सिर पर होना चाहिए।*
*????कब बांधी जाती है मौली? :-*
*विशेष कर मौली (कलावा) रक्षाबंधन के दौरान बांधी जाती है उसके अलावा पूजा- अनुष्ठान – यज्ञ – हवन इत्यादि के दौरान भी रक्षा सूत्र बांधा जाता है। कलावा बांधने के लिए मंगलवार और शनिवार का दिन शुभ माना जाता है। किसी भी पर्व काल के द्वारा या फिर मंगलवार और शनिवार को पुरानी मौली को उतारकर नई मौली बांधना उचित माना गया है। उतारी हुई पुरानी मौली को किसी वृक्ष के पास रख दें या किसी बहते हुए जल में बहा दें। प्रतिवर्ष की संक्रांति के दिन, पूजा- यज्ञ अनुष्ठान की शुरुआत में, कोई इच्छित कार्य के प्रारंभ में, मांगलिक कार्य, विवाह आदि संस्कारों के दौरान मौली बांधी जाती है।*
*????मौली को धार्मिक आस्था का प्रतीक माना जाता है:-*
*किसी अच्छे कार्य की शुरुआत में संकल्प के लिए भी बांधते हैं। किसी देवी या देवता के मंदिर में मनोकामना पूर्ति के लिए भी बांधते हैं। मौली बांधने के 3 कारण हैं – पहला आध्यात्मिक, दूसरा चिकित्सीय और तीसरा मनोवैज्ञानिक। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करते समय या नई वस्तु खरीदने पर हम उसे मौली बांधते हैं ताकि वह हमारे जीवन में शुभता प्रदान करे।*
*सनातन धर्म संस्कृतिक में प्रत्येक धार्मिक कर्म यानी पूजा-पाठ, उद्घाटन, यज्ञ, हवन, संस्कार आदि के पूर्व आचार्य – पुरोहितों द्वारा यजमान के दाएं हाथ में मौली बांधी जाती है। इसके अलावा पालतू पशुओं में हमारे गाय, बैल और भैंस को भी पड़वा, गोवर्धन और होली के दिन मौली बांधी जाती है।*
*????मान्यताओं के अनुसार मौली संकटों से रक्षा करती है-:*

