सहारनपुर । वंदे मातरम् पर संसद में चली बहस के बीच मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि हमें किसी के गीत पढ़ने पर आपत्ति नहीं, लेकिन इसकी कुछ पंक्तियां इस्लामी आस्था के खिलाफ हैं। उन्होंने कहा कि संविधान धार्मिक स्वतंत्रता देता है और किसी को भी उसकी आस्था के विरुद्ध गीत गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
संसद में वंदे मातरम् पर हुई बहस पर जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि हमें किसी के वंदे मातरम् पढ़ने या गाने पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन हम यह बात फिर से स्पष्ट करना चाहते हैं कि मुसलमान केवल एक अल्लाह की इबादत करता है और अपनी इस इबादत में किसी दूसरे को शरीक नहीं कर सकता। मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि वंदे मातरम् बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास ‘आनंद मठ’ से लिया गया एक अंश है। इसकी कई पंक्तियां इस्लाम के धार्मिक सिद्धांतों के खिलाफ हैं, इसलिए मुसलमान इस गीत को गाने से परहेज करते हैं। कहा कि वंदे मातरम् का पूरा अर्थ है मां मैं तेरी पूजा करता हूं। यह शब्द स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि यह गीत हिंदू देवी दुर्गा की प्रशंसा में लिखा गया था न कि भारत माता के लिए। कहा कि इस्लाम एकेश्वरवाद पर आधारित धर्म है, जो एक ऐसे ईश्वर की पूजा करता है जिसका कोई साझीदार नहीं है। किसी देश या मां की पूजा करना इस सिद्धांत के खिलाफ है। वंदे मातरम् गीत मां के सामने झुकने और उसकी पूजा करने की बात करता है, जबकि इस्लाम अल्लाह के अलावा किसी के सामने झुकने और पूजा करने की अनुमति नहीं देता। इसलिए हम इसे किसी भी हाल में स्वीकार नहीं कर सकते। मर जाना स्वीकार है, लेकिन शिर्क (अल्लाह के साथ किसी साझी) स्वीकार नहीं है।
मौलाना अरशद मदनी ने मंगलवार को जारी बयान में कहा की वंदे मातरम् की कुछ पंक्तियां ऐसे धार्मिक विचारों पर आधारित हैं जो इस्लामी आस्था के खिलाफ हैं। विशेष रूप से इसकी चार पंक्तियों में देश को दुर्गा माता जैसे देवी के रूप में प्रस्तुत किया गया है और उसकी पूजा के शब्द प्रयोग किए गए हैं, जो किसी मुसलमान की बुनियादी आस्था के विरुद्ध हैं।


